इस लेख में हम लोन EMI से संबंधित नियम और कानून की विस्तार से जानकारी लेंगे. आज के दौर में कोई भी चीज खरीदनी हो तो आम तौर पर लोग कर्ज लेते हैं. आज कल के लाइफ स्टाइल में कर्ज (लोन) लेना आम बात हो चुकी हैं. अगर आप को मकान खरीदना हैं तो आप तुरंत होम लोन ले लेते हैं. अगर आपको कार खरीदनी हैं तो आप कार लोन लेते हैं.
अगर आपको पैसों की जरूरत हैं तो आप पर्सनल लोन लेते हैं. इस तरह हम किसी भी चीज के लिए आसानी से कर्जा ले सकते हैं. आजकल तो कर्जा लेना बहुत ही आसान हो चूका हैं.
आपने हमेशा बड़े बूढों को ये कहते हुए सुना होगा की जितनी चद्दर हैं उतने ही पैर फैलाने चाहिए, ये कहावत खासकर कर्जा लेने के बारे में कहीं जाती हैं. लेकिन आज के दौर में लोग इस बारे में कम ही सोचते हैं और किसी भी चीज के लिए तुरंत कर्ज (लोन) का विकल्प चुनते हैं.
कई लोग अपनी आर्थिक तंगी के कारण तो कई लोग जान बुझकर अपने कर्ज (लोन) के किश्तों की भरपाई नहीं करते हैं. तो ये सवाल जरूर उठता हैं की अगर हमने कर्जों की किश्तें नहीं चुकाई तो क्या हो सकता हैं ? लोन ना चुकाने से कौन सी समस्याएं आ सकती हैं ? आइये आज के इस लेख में इस बारे में विस्तार से समझते हैं.
कर्ज (लोन) के कौनसे और कितने प्रकार होते है ?
कर्ज (लोन) दो प्रकार के होते हैं सुरक्षित कर्ज (Secured loan) और असुरक्षित कर्ज (Unsecured loan).
जब बैंक या कोई वित्तीय संस्था कर्जा देती हैं. तो ये सुनिश्चित करती हैं, की कर्जे की रकम ब्याज सहित वापिस मिले. इसीलिए बैंक कर्जा लेने वाली व्यक्ति की संपत्ति को अपने पास गिरवी रखती हैं. ताकि अगर वह व्यक्ति कर्जा नहीं चूका पाएं तो उस संपत्ति को बेचकर, कर्जे की रकम वापिस जुटा सकें. ऐसे कर्ज (लोन) को Secured कर्ज (लोन) कहाँ जाता हैं. होम लोन इसका एक उदाहरण हैं.
लोन डिफौल्ट किन कारणों से हो सकता हैं ?
कर्ज (लोन) डिफौल्ट होने के कई कारण हो सकते हैं. कुछ लोग जान बुझकर किश्तें नहीं चुकाते हैं. तो कई लोग मजबूरी में किश्तों की भरपाई नहीं कर पाते हैं. लोन डिफौल्ट के कुछ आम कारणों को समझते हैं.
- अचानक नौकरी छुट जाना – कर्ज (लोन) डिफौल्ट का ये एक अहम् कारण हो सकता हैं. नौकरी छुटने से आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता हैं इसलिए कर्जे की किश्तों की भरपाई ना करना मजबूरी बन जाती हैं.
- आपातकालीन मेडिकल परिस्थिति – कर्ज (Loan) डिफौल्ट का यह भी एक कारण हो सकता हैं. कर्ज (लोन) लेने वाला व्यक्ति या उसके परिवार में अगर किसी तरह की मेडिकल इमरजेंसी की परिस्थिति हैं तो कर्जे की किश्तों को नज़र अंदाज किया जा सकता हैं.
- आर्थिक मंदी – अभ्यासकों का मानना हैं की आर्थिक मंदी के दौर में अक्सर कर्जों की किश्तों को नहीं चुकाया जाता और इस दौर में सबसे ज्यादा कर्ज (लोन), डिफौल्ट की श्रेणी में आते हैं.
- महामारी – हाल ही में आये कोरोना महामारी की वजह से देश की आर्थिक स्थिति संकट में थी. उस दौर में भी सबसे ज्यादा कर्ज (लोन) डिफौल्ट के मामले सामने आये थे.
लोन डिफौल्टर कौन होता हैं ?
आम तौर पर जो लोग कर्जे के मूलधन और ब्याज की भरपाई नहीं करते हैं उन्हें डिफौल्टर माना जाता हैं. लेकिन ये इस तरह काम नहीं करता हैं. अगर आप भुगतान की एक तारीख को पैसे नहीं चूका पाते इसका मतलब आप तुरंत डिफौल्टर नहीं होते. बल्कि जब आप एक के बाद एक EMI का भुगतान नहीं करते हैं तो बैंक या वित्तीय संस्था जिनसे आपने कर्जा लिया हैं वह आपको डिफौल्टर के रूप में दर्ज कर सकते हैं.
हालाँकि आपको भुगतान के लिए कुछ समय भी दिया जाता हैं लेकिन इसके लिए आपको विलम्ब शुल्क चुकाना पड़ता हैं. इस तरह से बैंक आपको आपका क्रेडिट स्कोर सुधारने का एक मौका देती हैं. लेकिन अगर उस अवधि में भी आपने विलम्ब किये हुए और नियमित EMI का भुगतान नहीं किया तो बैंक आपको डिफौल्टर घोषित करता हैं और उस कर्ज (लोन) को डिफौल्ट की श्रेणी में डाला जाता हैं.
कर्ज (लोन) न चुकाने पर बैंक क्या करता है ?
लोन EMI से संबंधित नियम और कानून. जब भी आप कर्जा लेते हैं तो आपको EMI के भुगतान के लिए हर महीने की एक तारीख चुननी पड़ती है. उस तारीख को आपके बैंक खाते में EMI के भुगतान के लिए उतनी रकम होना अनिवार्य होता हैं. अगर किसी कारणवश आप से उस तारीख पर EMI का भुगतान नहीं हो सका तो बैंक सबसे पहले इसपर विलम्ब शुल्क लगाती हैं.
इसके बाद भी अगर आप EMI का भुगतान करने में असमर्थ हैं और आपके विलम्ब का कारण स्वीकार्य हैं तो बैंक आपको कुछ मोहलत दे सकती हैं जिस में आप EMI का भुगतान और विलम्ब शुल्क भर सकते हैं यह एक तरह से आपके क्रेडिट स्कोर को सुधारने का बैंक की तरफ से एक मौका होता हैं.
अगर फिर भी आप EMI के भुगतान में असमर्थ हैं तो बैंक आगे की कार्यवाही कर सकती हैं. इसके बारे में step by step समझते हैं.
- Step 1 – मासिक EMI ना भरने पर बैंक की तरफ से आपको संपर्क किया जा सकता हैं. यह संपर्क फ़ोन कॉल या एसएमएस के जरिये हो सकता हैं. इस तरह कर्ज लेने वाले व्यक्ति को सूचित किया जाता हैं की उस माह में EMI का भुगतान नहीं हुआ हैं.
- Step 2 – अगर कर्ज लेने वाले व्यक्ति ने लगातार 3 EMI का भुगतान नहीं किया हैं तो बैंक उस व्यक्ति को नोटिस भेज सकती हैं. जिस में बैंक आपको कर्ज (लोन) अवधि बढ़ाकर EMI की राशी कम करने का विकल्प भी दे सकती हैं. हालाँकि इससे आपकी ब्याज की राशी बढ़ सकती हैं.
- Step 3 – अगर कर्ज लेने वाला व्यक्ति इस नोटिस का जवाब नहीं देता हैं, तो बैंक उस व्यक्ति को डिफ़ॉल्टर घोषित कर देती हैं.
- Step 4 – बैंक इसके बाद उस कर्ज (लोन) को NPA घोषित कर सकती हैं. इसका मतलब हैं नॉन परफोर्मिंग एसेट (Non Performing Asset).
मामले को बैंक ले जा सकती है अदालत
- Step 5 – कर्ज (लोन) को NPA घोषित करने के बाद, बैंक इस मामले को अदालत में ले जा सकती हैं.
- Step 6 – अदालत इस मामले की छानबीन कर इस मामले का मुकदमा चला सकती हैं.
- Step 7 – अदालत ने अगर कर्ज लेने वाले व्यक्ति को इस मामले में दोषी पाया तो अदालत कर्ज (लोन) लेने वाले व्यक्ति के संपत्ति की नीलामी का आदेश दे सकती हैं अगर कर्ज लेने वाले व्यक्ति के पास लोन के मूलधन और ब्याज की राशी की पर्याप्त संपत्ति नहीं पाई जाती तो अदालत गैरेंटर के संपत्ति की नीलामी का आदेश भी दे सकती हैं.
संपत्ति की नीलामी से कर्ज रक्कम की वापसी
- Step 8 – इस तरह से संपत्ति के नीलामी से बैंक कर्जे की रकम वापस जुटा सकती हैं.
- Step 9 – संपत्ति के नीलामी के राशी से अगर बैंक के कर्ज (लोन) की मूलधन समेत ब्याज की आपूर्ति और क़ानूनी कारवाई के खर्च की आपूर्ति नहीं होती हैं, तो बैंक वापस अदालत में मुकदमा दर्ज करा सकती हैं.
- Step 10 – इस मामले को फिर से अदालत में क़ानूनी कारवाही के तहत दर्ज किया जाता हैं और दोषी पाने पर कर्ज लेने वाले व्यक्ति पर फौजदारी प्रक्रिया की तहत मुकदमा चलता हैं.
कर्ज (लोन) ना चुकाने से संबंधित भारत में कौन से कानून हैं ?
भारत में कर्ज (लोन) डिफौल्ट से संबधित कई कानून हैं. अलग-अलग मामलों में ये कानून उन मामलों के स्वरूप अनुसार लगाये जाते हैं. आम तौर पर लगाये जाने वाले कुछ कानूनों को विस्तार से समझते हैं.
- आईपीसी की धारा 403: यह कानून संपत्ति की बेईमानी से संबंधित है. इस धारा के तहत अधिकतम 2 वर्षों की सजा का प्रावधान है.
- आईपीसी की धारा 415: कानून की यह धारा तब लगती है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर संपत्ति से संबधित गलत जानकारी देता हैं या धोखाधड़ी करता हैं. इस अपराध के लिए इस धारा के तहत 1 वर्ष का कारावास या जुर्माने की या दोनों की सजा हो सकती हैं.
- आईपीसी की धारा 138: यह धारा चेक बाउंस से संबंधित हैं. चेक बाउंस होने पर इस धारा के तहत 2 वर्षों की सजा का प्रावधान हैं.
- आईपीसी की धारा 420: यह धारा जाली दस्तावेज और धोखाधड़ी से संबंधित हैं. अगर कोई व्यक्ति जाली दस्तावेज देकर कर्ज (लोन) लेता है तो उस व्यक्ति पर यह धारा लगती है और इस धारा में अधिकतम 7 वर्षों की सजा का प्रावधान है.
- आरडीबी अधिनियम 1993: कर्ज (लोन) वसूली और दिवालियापन अधिनियम 1993 को ही आरडीबी अधिनियम 1993 कहाँ जाता हैं. इस अधिनियम के तहत अगर किसी व्यक्ति ने ₹2000000 से अधिक का लोन लिया है तो उस पर इस धारा के तहत कारवाही होती हैं.
यह अधिनियम जमीन से संबंधित लोन पर लागू नहीं
लोन (कर्ज / ऋण ) से संबंधित नियमों के लिए आप आर.बी. आई. द्वारा मार्गदर्शक तत्व यहाँ देख सकते है.
SARFAESI अधिनियम 2002 : लोन EMI से संबंधित नियम और कानून. इसका मतलब हैं वित्तीय संपत्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण और सुरक्षा हितों का प्रवर्तन अधिनियम 2002. यह अधिनियम जमीन से संबंधित कर्ज (लोन) पर लागू नहीं होता है. यह अधिनियम उन कर्ज (लोन) पर लागू होता है जिस कर्ज (लोन) का सिर्फ ब्याज ₹100000 से अधिक हैं.
भारत में किसी भी जरूरत के लिए कर्जा लेना आम बात बन गयी हैं. लोग घर खरीदने के लिए, कार खरीदने के लिए, व्यापार के लिए या अन्य किसी जरूरत के लिए तुरंत लोन का विकल्प चुनते हैं. आजकल बैंक और अन्य वित्तीय संस्था द्वारा आसानी से कर्ज (लोन) मिल जाता हैं. लेकिन अगर उस कर्जे का भुगतान नहीं किया तो आप पर क़ानूनी कारवाही हो सकती हैं.
आज के इस लेख में हमने समझा की किस तरह से आप पर यह कार्यवाही हो सकती हैं, इन मामलों के लिए कौन से कानून हैं और कैसे कोई लोन डिफौल्ट की श्रेणी में आता हैं.अपनी जरूरत के लिए कर्ज (लोन) लेना एक अच्छा विकल्प हैं लेकिन इसका भुगतान करना आपकी जिम्मेदारी हैं. इस लिए समय पर अपने EMI का भुगतान जरूर करें.
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